Wednesday, September 28, 2016

तोमर वंश

तोमर या तंवर उत्तर-पश्चिम भारत का एक राजपूत वंश है। तोमर राजपूत क्षत्रियो में चन्द्रवंश की एक शाखा है और इन्हें पाण्डु पुत्र अर्जुन का वंशज माना जाता है इनका गोत्र अत्रीश होता है, जो कि अत्रि ऋषि से चला है। उत्तर मध्य काल में ये वंश बहुत ताकतवर वंश था और उत्तर पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से पर इनका शाशन था। देहली जिसका प्राचीन नाम ढिल्लिका था, इस वंश की राजधानी थी और उसकी स्थापना का श्रेय इसी वंश को जाता है।


परिचय

राजपूतों में तोमर वंश अपना अहम स्थान रखता है। पुराणों से प्रतीत होता है कि आरंभ में तोमरों का निवास हिमालय के निकटस्थ किसी उत्तरी प्रदेश में था। किंतु १०वीं शताब्दी तक ये करनालतक पहुँच चुके थे। थानेश्वर में भी इनका राज्य था। उस समय उत्तर भारत में कान्यकुब्ज के प्रतिहार राजपूत वंश का साम्राज्य था। उन्हीं के सामंत के रूप में तंवरों ने दक्षिण की ओर अग्रसर होना आरम्भ किया। दिल्ली में उनके अधिकार का समय अनिश्चित है। किंतु विक्रम की १०वीं और ११वीं शतियों में हमें साँभर के चौहानों और तोमरों के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। तोमरेश रुद्र चौहान राजा चंदन के हाथों मारा गया। तंत्रपाल तोमर चौहान वाक्पति से पराजित हुआ। वाक्पति के पुत्र सिंहराज ने तोमरेश सलवण का वध किया। किंतु चौहान सिंहराज भी कुछ समय के बाद मारा गया। बहुत संभव है कि सिंहराज की मृत्यु में तोमरों का कुछ हाथ रहा हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तोमर इस समय दिल्ली के स्वामी बन चुके थे। गज़नवी वंश के आरंभिक आक्रमणों के समय दिल्ली-थानेश्वर का तोमर वंश पर्याप्त समुन्नत अवस्था में था। तोमरराज ने थानेश्वर को महमूद से बचाने का प्रयत्न भी किया, यद्यपि उसे सफलता न मिली। सन् १०३८ ईo (संo १०९५) महमूद के पुत्र मसूद ने हांसी पर अधिकार कर लिया। मसूद के पुत्र मजदूद ने थानेश्वर को हस्तगत किया। दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी होने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि मुसलमान दिल्ली राज्य की समाप्ति किए बिना चैन न लेंगे। किंतु तोमरों ने साहस से काम लिया। तोमरराज महीपाल ने केवल हांसी और थानेश्वर के दुर्ग ही हस्तगत न किए; उसकी वीर वाहिनी ने काँगड़े पर भी अपनी विजयध्वजा कुछ समय के लिये फहरा दी। लाहौर भी तँवरों के हाथों से भाग्यवशात् ही बच गया। तोमरों की इस विजय से केवल विद्वेषाग्नि ही भड़की। तोमरों पर इधर उधर से अन्य राजपूत राज्यों के आक्रमण होने लगे। तँवरों ने इनका यथाशक्ति उत्तर दिया। संवत् ११८९ (सन् ११३२) में रचित श्रीधर कवि के पार्श्वनाथचरित् से प्रतीत होता है कि उस समय तोमरों की राजधानी दिल्ली समृद्ध नगरी थी और तँवरराज अनंगपाल अपने शौर्य आदि गुणों के कारण सर्वत्र विख्यात था। द्वितीय अनंगपाल ने मेहरोली के लौह स्तंभ की दिल्ली में स्थापना की। शायद इसी राजा के समय तँवरों ने अपनी नीति बदली। अपने राजपूत पड़ोसियों से उन्होंने युद्ध चालू रखा किंतु मुसलमानों से संधि कर ली। इस नई नीति से क्रुद्ध होकर चौहानों ने दिल्ली पर और प्रबल आक्रमण किए। चौहान राजा बीसलदेव तृतीय न संवत् १२०८ (सन् ११५१ ईo) में तोमरों को हरा कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसके बाद तँवर चौहानों के सामंतों के रूप में दिल्ली में राज्य करते रहे। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार हुआ। फिरोजशाह तुगलक के समय ग्वालियर पर तँवरों की एक दूसरी शाखा ने अधिकार किया। इसने यहाँ लगभग १५० वर्ष तक राज्य किया। तंवरराज रामसाह महाराणा प्रताप के पक्ष में लड़ता हुआ अपने दो पुत्रों सहित हल्दीघाटी के प्रसिद्ध युद्ध में काम आया। ग्वालियर के तँवरों ने कला, साहित्य और संस्कृति के सरंक्षण का पर्याप्त कार्य किया है।


वर्तमान में तोमर राजपूत वंश

देहली में तोमरो के पतन के बाद तोमर राजपूत विभिन्न दिशाओ में फ़ैल गए। एक शाखा ने उत्तरी राजस्थान के पाटन में जाकर अपना राज स्थापित किया जो की जयपुर राज्य का एक भाग था। ये अब 'तँवरवाटी'(तोरावाटी) कहलाता है और वहाँ तँवरों के ठिकाने हैं। मुख्य ठिकाना पाटण का ही है। एक शाखा चम्बल क्षेत्र में गई जहाँ तोमर राजपूतो की बसापत १४०० गाँव में है। इस क्षेत्र को तंवरघार बोला जाता है। इस शाखा ने कई सदी ग्वालियर पर राज किया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरयाणा में जहां तोमरो का शासन था वहा आज भी तोमर/तंवर राजपूत बड़ी संख्या में मिलते है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ग़ाज़ियाबाद जिले में पिलखुवा के पास तोमर राजपूतों के 84 गाँव है। इनमे मुकीमपुर गढ़ी भी है जिसने 1857 की क्राँति में भाग लिया और यहाँ के कई लोग शहीद हुए। गढ़मुक्तेश्वर के पास तोमरो के 42 गाँव है। राजा अनंगपाल के एक पुत्र भद्रसेन ने यहाँ आकर अहिरो से इस क्षेत्र को जीता और भदस्याना नामक गाँव बसाया जिससे भैना, धौलपुर,लिसडी जैसे कई गाँव निकले है जिनकी संख्या आज 42 है। मेरठ के पास भी तोमरो के 12 गाँव है जिसमे सिसौली, मऊ ख़ास, पंचगांव प्रमुख है। बुलंदशहर जिले में भी तोमरो के 24 गाँव गुलावठी और सिकंदराबाद के बीच में है जिसमे बराल प्रमुख है। खुर्जा के पास भी धरपा जैसे 5 गाँव तोमरो के है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तोमरों की एक शाखा जंघारा भी मिलती है जिसका इतिहास बहुत गौरवशाली है और जिन्होंने लंबे समय तक आज के रोहिल्लखंड में मुस्लिम शाशकों से टक्कर ली और उन्हें चैन से बैठने नही दिया। दिल्ली के पतन के बाद कुछ तोमर रोहिल्लखंड में आए और अहीरों को भगाकर अपना राज स्थापित किया। जंघारा का मतलब होता है जंग के लिए भूखे। ये बहुत लड़ाका वंश है इसलिए इसका नाम जंघारा पड़ा। जंघारा बरेली, शाहजहाँपुर, बदायूं, एटा, फर्रुखाबाद में बहुत बड़ी संख्या में मिलते है। अलीगढ़ में भी जंघारा के 42 गाँव है। इसके अलावा आगरा, फीरोजाबाद आदि जिलो में भी तोमर राजपूत अच्छी संख्या में मिलते है। हरयाणा में भी भिवानी क्षेत्र में बड़ी संख्या में तंवर राजपूत मिलते है जिन्हें जाटू तंवर कहा जाता है। मेवाड़ के सलुम्बर ठिकाने में वहा के राजा द्वारा तँवर राजपूतो को कई गाँव मुण्डकटी और सिरकटी के बदले जागीरी में मिले वर्तमान में बोरज तँवरान सलुम्बर में तँवरो की जागीरी का गांव है


जाट, गूजर और अहीर में तोमर राजपूतो से निकले गोत्र

कुछ तोमर राजपूत अवनत होकर या तोमर राजपूतो के दूसरी जाती की स्त्रियों से सम्बन्ध होने से तोमर वंश जाट, गूजर और अहीर जैसी जातियो में भी चला गया। जाटों में कई गोत्र है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है जैसे पिलानिया, नैन, मल्लन, लाम्बा,खटगर, खरब, ढंड, भादो, खरवाल, सोखिरा, रोनिल, सकन,बेरवाल और नारू। ये लोग पहले तोमर या तंवर उपनाम नहीँ लगाते थे लेकिन इनमे से कई गोत्र अब तोमर या तंवर लगाने लगे है। उत्तर प्रदेश के बड़ौत क्षेत्र के सलखलेन् जाट भी अपने को किसी सलखलेन् का वंशज बताते है जिसे ये अनंगपाल तोमर का धेवता बताते है और इस आधार पर अपने को तोमर बताने लगे है। गूँजरो में भी तोमर राजपूतो के अवशेष मिलते है। खटाना गूजर अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है। ग्वालियर के पास टोंगर गूजर मिलते है जो ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर की गूजरी रानी मृगनयनी के वंशज है जिन्हें गूजरी माँ की औलाद होने के कारण राजपूतों ने स्वीकार नहीँ किया।दक्षिणी दिल्ली में भी तँवर गूजरों के गाँव मिलते है। मुस्लिम शाशनकाल में जब तोमर राजपूत दिल्ली से निष्काषित होकर बाकी जगहों पर राज करने चले गए तो उनमे से कुछ ने गूजर बनकर मुस्लिम शाशकों के अधीन रहना स्वीकार किया। हरयाणा के अहिरो में भी दयार गोत्र मिलती है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है।